1965 में, वे बरकतों के बाग़ और आलमी पहचान रखने वाले शहर मुंबई चले गए। वहाँ उन्होंने सय्यदुल उलेमा हज़रत अल्लामा सय्यद शाह आले-रसूल क़ादरी नूरी मीराठवी (रहमतुल्लाह अलैह) की ख़ुशबू में डूबकर उनके सिलसिले में बैअत कर ली और उनके मुरीद बन गए।
क़ुरआन के गहरे इल्म से लैस होकर, उन्होंने अपनी दीनी तालीम को आगे बढ़ाया और जालौन के ओराई में दारुल उलूम मोहम्मदिया में अपने इल्मी खज़ाने को बाँटना शुरू किया। क़िराअत की सख़्त तलब को महसूस करते हुए, वे लखनऊ के मदरसा तजवीदुल फ़ुरक़ान पहुँचे। वहाँ हज़रत अल्लामा मुफ़्ती शरीफ़ुल हक़ अमजदी (रहमतुल्लाह अलैह) के हुक्म पर उन्होंने क़िराअत की फ़नकारी को सीखना शुरू किया। इस सफ़र में उनके उस्ताद शैख़ुल क़िरा हज़रत मौलाना क़ारी मुहिबुद्दीन थे, जो उस्ताज़ुल मुझव्विदीन हज़रत मौलाना क़ारी ज़ियाउद्दीन के फ़रज़ंद थे।
1972 में, क़िराअत के इस इल्मी फ़न में माहिर होने के बाद, उन्होंने 1973 में लखनऊ की जामा मस्जिद, मछली मुहाल में स्थित मदरसा आलिया वारसिया में ख़िदमत शुरू की। सिर्फ़ एक साल के छोटे से अरसे में उन्होंने निज़ामिया तालीम के दरूस का आग़ाज़ किया।
वे बुलंद हौसले वाले इंसान थे, जो कभी आख़िरी मक़ाम पर यक़ीन नहीं रखते थे, बल्कि इस्लाम और उसकी तालीमात की ख़िदमत के आसमान तक पहुँचने की आरज़ू रखते थे। यही हौसला उन्हें क़ौम के अज़ीम रहनुमा मुजाहिद-ए-मिल्लत हज़रत अल्लामा हबीबुर्रहमान ओरिसी (रहमतुल्लाह अलैह) के पास ले गया, जिन्होंने उन्हें मुसलमानों की आबादी वाले इलाक़े उजड़ियॉं, जो पहले घने जंगलों से घिरा था, वहाँ एक तालीमी इदारा क़ायम करने की नसीहत दी।
ख़ुदा का शुक्र है कि आज यही जगह लखनऊ के सबसे मशहूर इलाक़ों में शामिल गोमती नगर के नाम से जानी जाती है। उजड़ियॉं के कुछ दरियादिल लोगों ने अपनी ज़मीनें इस नेक मक़सद के लिए वक़्फ़ कर दीं, और दस बीघा ज़मीन का एक हिस्सा ख़रीदकर इस नज़रियाती शख़्स ने दारुल उलूम वारसिया की बुनियाद रखी।
7 नवंबर 1982, इतवार के दिन इस्लामी उलमा के हाथों इस अज़ीम इदारे की बुनियाद रखी गई। लेकिन अब क़ारी साहब को कई मुश्किलों और चैलेंज का सामना करना था। कुछ लोग हसद और ज़ाती अदावत की वजह से, तो कुछ दूसरे मज़ाहिब के लोग इस तामीर में रोड़े अटका रहे थे। दूसरी तरफ़ लखनऊ डिवेलपमेंट अथॉरिटी की सख़्तियाँ सबसे बड़ी चुनौती बनकर सामने आईं।
लेकिन उनके पक्के इरादों और सब्र ने हर मुश्किल का सामना किया। कुछ लोगों ने इसे "बेकार की कोशिश" कहा, लेकिन उनके इरादे कभी नहीं डगमगाए। आख़िरकार अल्लाह तआला की मदद से उनकी मंशा पूरी हुई। उनके रुहानी क़ुव्वतों ने इन तमाम चुनौतियों को मात देकर इस्लामी, तालीमी और समाजी बेहतरी की राह खोल दी।
इस तरह, इल्म, सब्र और अज्म से भरपूर इस इंसान ने एक अज़ीम दीनी इदारे को हमेशा-हमेशा के लिए कायम कर दिया। यह इदारा आज न सिर्फ़ मुल्क में, बल्कि आलमी सतह पर भी अपनी पहचान बना चुका है।
आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खां (रहमतुल्लाह अलैह) के तालीमात से माला-माल यह इदारा आज तक इस्लामी इल्म को ज़िंदा रखे हुए है। "पैग़ाम-ए-रिसालत कॉन्फ़्रेंस" और "सुन्नी तब्लीगी इज्तिमा" जैसी अज़ीम तक़रीबात इस इदारे की बेहतरीन कारगुज़ारियों में शामिल हैं।
उनकी ख़िदमात में अहले सुन्नत की मस्जिदों में इमामों की तैनाती और लखनऊ में ग़लत अ़क़ीदे वाले लोगों के क़ब्ज़े से कई मस्जिदों को आज़ाद कराना भी शामिल है। उन्होंने इस्लाम की सही तालीम को फैलाने के लिए पैदल सफ़र किया और कभी-कभी साइकिल पर सवार होकर दूर-दराज़ की मस्जिदों में इमामत करने जाते थे।
दारुल उलूम वारसिया की ज़मीन को हिफ़ाज़त देने और इस इदारे को तमाम मुश्किलों के बावजूद बुलंदी तक पहुँचाने में उनका कोई सानी नहीं था। रज़ा जामा मस्जिद, अल्लामा फ़ज़्ले हक़ खैराबादी लाइब्रेरी, और गर्ल्स इंटर कॉलेज जैसी शानदार तामीरात उनकी बेमिसाल ख़िदमात में शामिल हैं।
उनकी ये बेपनाह ख़िदमात क़यामत तक याद रखी जाएंगी। वे इस्लाम के बड़े ख़िदमतगुज़ारों में से एक थे, जिन्हें हज और हरमैन शरीफ़ैन की ज़ियारत नसीब हुई। आख़िरकार, यह दरियादिल इंसान, जिसने अपनी ज़िंदगी रोशनियों से भर दी, 8 अगस्त 2009, शनिवार को दोपहर 2 बजे इस फ़ानी दुनिया से रुख़्सत कर गया।
(अल्लाह तआला उनकी क़ब्र को नूर से भर दे और जन्नतुल फिरदौस में आला मुक़ाम अता करे, आमीन!)