प्रबंधक का संदेश

प्रबंधक के डेस्क से
इल्म ऐसी अबदी नेमत और दौलत है जो बग़ैर किसी तफ़रीक़ के सबको फ़ायदा पहुँचाती है। इंसान अल्लाह की तमाम मख़लूक़ात पर अफ़ज़ल है, मगर बग़ैर इल्म के "इंसान जिस्म बग़ैर रूह के मानिंद है।" यह कहना ग़लत न होगा कि इस्लाम पूरी तरह इल्म पर मबनी है और इस्लामी मुआशरा सिर्फ़ इल्म की बुनियाद पर तरक़्क़ी करता आया है। हक़ीक़त यह है कि बग़ैर इल्म के मज़हब और ईमान बाक़ी नहीं रह सकते।
अगर अल्लाह तआला अपने फ़रिश्ते के ज़रिए यह हुक्म न देता "इक़रा" (पढ़ो), तो इल्म की अहमियत वाज़ेह न होती और न ही इस वसीअ ज़मीन पर रसूलुल्लाह के कोई पैरोकार और अल्लाह की इबादत करने वाले मिलते। गुज़िश्ता दौर में लोग समुंदर से सिर्फ़ एक क़तरा इल्म के लिए बड़ी मेहनत करते थे, मगर इल्म सिखाने का कोई मुनज़्ज़म निज़ाम न था।
हिंदुस्तान में मुग़ल दौर के ख़त्म होने के बाद अंग्रेज़ी हुकूमत क़ायम हुई, जो अपने साथ एक मुनज़्ज़म तालीमी निज़ाम लेकर आई। इस तरह तालीम का पूरा निज़ाम एक शख़्सियत के बजाय इदारों में तब्दील हो गया। इससे तालीम को नया रौशन दौर मिला और लोग जो तालीम के लिए तरस रहे थे, उन्हें मुकम्मल और मुस्तक़िल इदारों से बहरहाल फ़ायदा पहुँचा।
आज पूरी इंसानियत इस बहुपहलू तालीम के ज़ेवर से आरास्ता होती नज़र आ रही है।