उन्हों ने ये क़सम खाई के इस्लाम की असल तहज़ीब और डिसिप्लिन को दोबारा ज़िंदा किया जाए, और अपनी नौजवान नस्ल के दिलों में सच्चे दीन की गर्मी उतारी जाए। इस टीम में ऐसे अक़्लमंद शामिल थे जो इस्लामी तालीमात के रोशन उसूलों के मुताबिक़ हर तरह के दुनियावी और एडमिनिस्ट्रेटिव मसाइल हल करने की सलाहियत रखते थे।
ये सब मरहूम क़ारी अबुल हसन क़ादरी (रहमतुल्लाह अलैह) की पहल से मुमकिन हुआ, जिन्हों ने मुजाहिद-ए-मिल्लत हज़रत अल्लामा हबीबुर्रहमान (रहमतुल्लाह अलैह) से एक आला दर्जे का मदरसा क़ायम करने की तजवीज़ पेश की। उन्हों ने लखनऊ को इसका मक़ाम तजवीज़ किया। ये सुनकर मुजाहिद-ए-मिल्लत बेइंतिहा खुश हुए और इस ख्याल की पूरी हिमायत की। जब उनकी मुकम्मल रज़ामंदी मिल गई, तो गोमती नदी के किनारे, उजरियॉं (आज का गोमती नगर) में एक मुनासिब जगह पसंद की गई।
बाद में गोमती नगर लखनऊ का दिल बन गया। मदरसे की हदबंदी के लिए दस बीघा ज़मीन ली गई। इसका कुछ हिस्सा उजरियॉं के रहने वालों की मिल्कियत था, लेकिन दीनी जज़्बे से सरशार इन लोगों ने अपनी ज़मीन ख़ुशी-ख़ुशी इस मज़हबी मकसद के लिए वक़्फ़ कर दी। बाक़ी ज़मीन ख़रीदी गई।
रविवार, 7 नवंबर 1982, को हज़रत सैयद शाह मुज़फ़्फ़र हुसैन किछौछवी (रहमतुल्लाह अलैह) के पाक हाथों से मदरसे की बुनियाद रखी गई। इस मौके पर कई अज़ीम उलमा-ए-कराम मौजूद थे, जिनमें मुफ़्ती-ए-आज़म-ए-हिंद अल्लामा मुस्तफा रज़ा ख़ान क़ादरी नूरी, सय्यदुल उलमा अल्लामा शाह आले-मुस्तफा मरहरवी, अमीन-ए-शरीअत अल्लामा मुफ़्ती रिफ़ाक़त हुसैन क़ादरी, नाशिर-ए-सुन्नियत हज़रत सैयद शाह असगर मियाँ चिश्ती और मुफ़्ती शरीफ़ुल हक़ अमजदी जैसे बुजुर्ग शामिल थे।
अल्लाह के फ़ज़ल से, दारुल उलूम वारसिया आज उत्तर प्रदेश के आला दीनी इदारों में शुमार किया जाता है और इस पर बड़े रुहानी शख़्सियात की रहमतें और बरकतें नाज़िल हैं। ये इदारा क़ौम और मिल्लत की बेहतरीन ख़िदमत कर रहा है और आगे भी इंशाअल्लाह और बेहतर नताइज देगा।
दारुल उलूम वारसिया का मक़सद मुसलमानों के दिलों में इस्लाम की असली रूह को जागरूक करना है। ये मदरसा मुस्लिम समाज की इस्लाही तहरीक में अहम किरदार अदा कर रहा है, हालांकि मौजूदा दौर में इसे कई मुश्किलात और माली परेशानियों का सामना है। बावजूद इसके, ये सब्र और हिम्मत के साथ अपनी मंज़िल की तरफ़ बढ़ रहा है।
हर साल सैकड़ों बच्चे मुल्क के मुख़्तलिफ़ इलाकों से यहाँ तालीम हासिल करने आते हैं। ये हिफ़्ज़, किराअत, आलिमियत, फ़ाज़िलत जैसे मज़ाहिबी शोबों में दाख़िला लेते हैं और जब मुकम्मल तालीम पाकर निकलते हैं, तो पूरे मुल्क और दुनिया में इस्लाम की सही तालीमात फैलाने का बेहतरीन काम अंजाम देते हैं। ये सच्चे इस्लामी सिपाही हैं जो दारुल उलूम वारसिया का नाम रोशन कर रहे हैं।
लखनऊ के इस इलाक़े में जो इल्मी और दीनी तालीम का मरकज़ बन चुका है, यहाँ क़रीब 150 मस्जिदों में इस मदरसे के तालिब-ए-इल्म बतौर इमाम और ख़तीब अपनी ख़िदमत अंजाम दे रहे हैं। ये लोग शरीअत की गहरी समझ के साथ नमाज़ियों को हदीस और तफ़सीर-उल-क़ुरआन की तालीम देते हैं। इनकी खिदमात को न सिर्फ़ मुसलमान बल्कि दीगर क़ौमों के लोग भी तस्लीम करते हैं।
दारुल उलूम वारसिया की बड़ी इमारतें, दो मंज़िला क्लासरूम, लाइब्रेरी, ऑडिटोरियम और वसीअ खेल का मैदान देखने वालों को हैरान कर देता है। यहाँ से तालीम हासिल करने वाले जब अपने वतन लौटते हैं और इस मदरसे की बातें अपने दोस्तों से करते हैं, तो उनके दिलों में भी यहाँ आने की तम्मना जाग उठती है।
आज 80 से ज़्यादा असातिजा और मुलाज़िमीन बच्चों की तर्बियत और तालीम में जी-जान से लगे हुए हैं। 1300 से ज़्यादा तालिब-ए-इल्म यहाँ पढ़ रहे हैं, जिनमें ज़्यादातर होस्टल में रहने वाले हैं। मदरसा लॉजिंग, खाने-पीने, बिजली, दवाइयों और तिब्बी सहूलतों का पूरा बंदोबस्त करता है। सर्दियों में लिहाफ़ और कंबल, और गर्मियों में छत वाले पंखे और कूलर तक का इंतिज़ाम किया जाता है।
इसके अलावा, एक पब्लिक स्कूल और 800 लड़कियों के लिए इंटर कॉलेज भी इसी मैनेजमेंट के ज़ेरे-निगरानी चल रहा है, साथ ही दारुल उलूम वारसिया की कई और शाखाएं भी दीनी और तालीमी खिदमतों में मसरूफ़ हैं।
ये बड़ी ज़िम्मेदारी है जो दारुल उलूम वारसिया निभा रहा है, और ये सब आप जैसे ख़ैरख़्वाहों और मददगारों के बिना मुमकिन नहीं। इसलिए, हम आपसे दिल से गुज़ारिश करते हैं के इस नेक मक़सद में अपना क़ीमती तआवुन पेश करें और इस्लामी तालीम की सरपरस्ती के लिए आगे बढ़ें।
आपके बग़ैर हम अधूरे हैं। अगर आप आगे बढ़ें तो ये इदारा और भी बुलंदियाँ हासिल कर सकता है। अल्लाह तआला आपको बेशुमार रहमतों से नवाज़े और बेहतरीन इनआम अता करे। (आमीन)।